Bhagavad Gita: अध्याय 17, श्लोक 16

मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: |
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते || 16||

मनः-प्रसादः-मन की प्रसन्नता; सौम्यत्वम्-विनम्रता; मौनम् मौन धारण करना; आत्म-विनिग्रह-आत्म नियन्त्रण; भाव-संशुद्धिः-लक्ष्य की शुद्धि; इति–इस प्रकार; एतत्-ये; तपः-तपस्या; मानसम्-मन की; उच्यते-इस प्रकार से घोषित किया गया है।

अनुवाद

BG 17.16: विचारों की शुद्धता, विनम्रता, मौन, आत्म-नियन्त्रण तथा उद्देश्य की निर्मलता इन सबको मन के तप के रूप में चित्रित किया गया है।

भाष्य

शरीर तथा वाणी की तुलना में मन का तप अधिक श्रेष्ठ है। यदि हम अपने मन को नियंत्रित करना सीख लेते हैं तब शरीर तथा वाणी स्वतः ही नियंत्रित हो जाएंगे। किन्तु यदि हम इसके विपरीत व्यवहार करते हैं तब आवश्यक नहीं कि मन नियंत्रित हो। वस्तुतः किसी व्यक्ति की अंतः चेतना को उसकी मन की अवस्था ही निर्धारित करती है। श्रीकृष्ण ने श्लोक 6.5 में बताया था-"मन की शक्ति द्वारा स्वयं को उन्नत करो और स्वयं को नीचा न समझो क्योंकि तुम्हारा मन तुम्हारा मित्र भी हो सकता है और शत्रु भी।" 

मन एक बगीचे के सदृश है जिसे या तो भली प्रकार विकसित किया जा सकता है अथवा जिसे जंगल की तरह रहने दिया जा सकता है। किसान अपने खेत को जोतते हैं और इसमें फल, फूल तथा सब्जियों उगाते हैं। इसके साथ-साथ वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि यह खरपतवार से भी मुक्त रहें। इसी प्रकार से हमें अपने मन से नकारात्मक विचारों को निकालते हुए उसे उत्तम विचारों द्वारा उन्नत बनाना चाहिए। यदि हम क्रोधयुक्त, द्वेषयुक्त, घृणास्पद, दोषपूर्ण, निर्मम, जटिल तथा आलोचनात्मक विचारों को अपने मन में स्थान देंगें तब इनका हमारे व्यक्तित्व पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। हम तब तक कोई भी रचनात्मक कार्य नहीं कर सकते जब तक हम अपने मन को नियंत्रित करना तथा इसे क्रोध, घृणा, वैमनस्य इत्यादि से उत्तेजित होने से दूर रखना नहीं सीख लेते। ये वही खरपतवार है जो हमारे हृदयों में दिव्य कृपा के प्रस्फुटन के मार्ग को अवरुद्ध करते हैं। 

लोग मानते हैं कि उनके विचार अदृश्य हैं और मन के भीतर होने के कारण उनका कोई बाह्य महत्व नहीं है तथा वे अन्य लोगों की दृष्टि से परे हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि विचार न केवल उनके आंतरिक चरित्र का बल्कि उनके बाह्य चरित्र का भी निर्माण करते हैं। अतः हम किसी को देखकर कहते हैं-"वह बहुत सादा तथा विश्वसनीय व्यक्ति लगता है" और किसी अन्य व्यक्ति के लिए कहते हैं-"वह बहुत ही धूर्त तथा धोखेबाज लगता है उससे तो दूर ही रहो।" यह विचार ही थे जिन्हें लोगों ने अपने हृदय में प्रश्रय दिया और वे ही मूर्त रूप में उनके व्यक्तित्त्व के रूप में प्रकट हुए। रॉल्फ वॉल्डो इमर्सन ने कहा था कि "हमारे नेत्रों की झलक में, हमारी प्रसन्नताओं में, हमारे अभिवादनों में और हाथों के स्पर्श में हमारा व्यक्तित्व चित्रित है। हमारे पापकर्म हमें दूषित करते हैं, समस्त अच्छी धारणाओं का विनाश करते हैं। लोग नहीं जानते कि वे क्यों हमारा विश्वास नहीं करते। बुराई आंखों पर पर्दा डालती है, हमारे कोपलों की लालिमा को मंद करती है, हमारी नाक नीची करवाती है और राजा को कलंकित कर उसके मस्तक पर 'हे मूर्ख, मूर्ख' लिखती है।" विचारों का चरित्र के साथ संबध करने वाले अन्य कथन इस प्रकार हैं-

अपने विचारों पर ध्यान दें क्योंकि यही शब्द बन जाते हैं। 

अपने शब्दों पर ध्यान दें क्योंकि यही आपकी प्रतिक्रिया बन जाते हैं। 

अपनी क्रियाओं पर ध्यान दें क्योंकि यही आपकी आदतें बन जाती हैं। 

अपनी आदतों पर ध्यान दें क्योंकि इन्हीं आदतों से आपका चरित्र निर्माण होता है। 

अपने चरित्र पर ध्यान दें क्योंकि यही आपका भाग्य बनाता है।

यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक नकारात्मक विचार जिन्हें हम अपने मन में प्रश्रय देते हैं उनसे हम स्वयं को हानि पहुँचाते हैं। साथ ही प्रत्येक सकारात्मक विचार जिनपर हम अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उनसे हमारा उत्थान होता है। हेनरी वान डाईक ने अपनी कविता 'थॉट्स आर् थिंग्स' में इसे विशद रूप से व्यक्त किया है

मैं इसे सत्य मानता हूँ कि सभी विचार वस्तुमात्र हैं। 

वे शरीर, श्वासों और पंखों से युक्त हैं। 

वे जिन्हें हम अपने गोपनीय विचार कहते हैं। 

वह चौगुनी गति से पृथ्वी के दूरस्थ स्थान पर। 

अपने गौरव और संतापो को पीछे छोड़ते हुए पटरियों छूटने के समान आगे बढ़ते हैं। 

हम विचारों द्वारा अपना भविष्य निर्माण करते हैं। 

परंतु ये शुभ या अशुभ हैं। 

यह कोई नहीं जानता इसलिए अपनी नियति का चयन करो और प्रतीक्षा करो।

प्रेम से प्रेम बढ़ता है और घृणा से घृणा उत्पन्न होती है।

प्रत्येक विचार जिन पर हम अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं उनके फल हमें प्राप्त होते हैं तथा प्रत्येक विचार से हमारे भाग्य का निर्माण होता है। इसी कारण नकारात्मक भावों से मन को हटाकर सकारात्मक भावों को मन के भीतर स्थान देने को मन का तप कहा गया है।

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17. श्रद्धा त्रय विभाग योग

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